लोकगाथाओं में सांस्कृतिक चेतना

मई 20, 2006

-डॉ.जगदीश व्योम
मानव की हर्ष और विषादात्मक मूल भावनाएँ जब परिवेश में व्याप्त सुख-दुःख रूपी मनव विकारों की सहज अनुभूति कर तदाकार ही जाती हैं, तब वह अपने मानव की अतल गहराइयों में अवस्थित किसी घटना के पात्रादि को स्वयं पर आरोपित कर लेता है, ऐसे समय पर वाग्देवी स्वयं उसके कण्ठ से फूट पड़ती है। इस प्रकार लोककण्ठ से सहज रूप से निसृत कथा, वृत्तान्त, घटना आदि लोक में प्रचलित शब्दों का परिधान पहनकर इठलाती, बलखाती, थिरकती और गाती हुई लोक को इतना विमोहित कर लेती है कि एक कण्ठ से दूसरे कण्ठ में, अपने अधिवास की अनेकानेक शताब्दियाँ व्यतीत कर देने पर भी, यदा-कदा थोड़े बहुत वस्त्र बदलकर उसी रूप में अपने आकर्षण के जादू से लोक को विमोहित किए रहती है। वर्तमान युग में लोककण्ठ की इस अनिद्य लोक-सुन्दरी का नाम ही लोकगाथा है। लोकगाथाएँ लम्बे आख्यान वाले गीत है जिनमें कोई न कोई कथा होती है।
लोक कथाओं की वैदिक काल से लेकर रामायण व महाभारत काल तक अक्षुण्ण परम्परा रही है। रामायण में नारद एवं लवकुश तथा महाभारत में संजय को गाथा गायक कहा जा सकता है। लव और कुश तो समय आने पर अपने पिता के पास चले गए परन्तु गाथा गाने की परम्परा छोड़ गए। लोकगाथा गायन की यह परंपरा आज भी बनी हुई है। गाथा गायक ही लोकगाथाओं के संवाहक रहे हैं। लोकगाथाओं की सजीवता तभी तक है जब तक उनका प्रचलन मौखिक रूप से होता है। लोकगाथा गायकों की एक लम्बी परम्परा रही है। लोकगाथा गायकों की एक लम्बी परम्परा रही है जिनमें-सूत, माग्ध, बन्दी, कुशीलव, वैतालिक, चारण, भाट, जोगी आदि हैं।
लोकगाथाओं में सम्पूर्ण लोक, समाज, रीतिरिवाज, सम्बन्ध, संस्कार, त्यौहार, रूढ़ियाँ, परम्पराएँ आदि सबका चित्रण रहता है। लोक-संस्कृति को लोकगाथाएँ पोषित करती हैं एवं उन्हें अपने उदर में समाहित किए रहती हैं। अपने युग की सभ्यता और संस्कृतियों को समय अपनी परतों के तले दबाता हुआ सतत आगे बढ़ता रहता है। संस्कृतियों का यह दबा-कुचला शरीर लोकगाथाओं की अन्त: चेतना बनकर एक युग से दूसरे युग को उसकी परम्परा एवं विकास की सूचना देता रहता है।
लोक मानव सीधा-साधा, सहज विश्वास करने वाला होता है। लोक गाथाओं के माध्यम से जो समाज हमारे समक्ष आता है उसमें सभी पक्षों को स्पष्टत: देखा जा सकता है। धार्मिक तथा नैतिक भावना तो लोक समाज का प्राण ही है। सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहलू धर्म है। हमारे वैदिक ऋषियों ने सामाजिक संरचना के समय धर्म को इस भाँति लोक मानव से जोड़ दिया कि सम्पूर्ण सृष्टि ही धर्ममय हो गयी। लोक-मानव जिन बातों को, जिन गूढ़ रहस्यों को समझने में सदियों लगा देता, धर्म के नाम पर या इस प्रकार की गई शिक्षा को उसने पलभर में सीख लिया। लोकमानव प्रकृति के कण-कण में ईश्वर का निवास मानता है, उसके प्रति पूज्य भाव रखता है। हमारे यहाँ जो भी कर्म किया जाता है उसकी परख की कसौटी स्वर्ग होता है। व्यक्ति कोई कार्य करने से पूर्व उसके विषय में सोचता है कि इसका फल क्या होगा, इस भय से बुरा काम दूर ही बना रहता है। दूसरा सबसे बड़ा डर नरक का होता है। लोक-मानव का हृदय इन्हीं धार्मिक भावनाओं से अनुशासित रहता है। यह अनुशासन उसके अन्दर का अनुशासन है जिसका पालन वह आजीवन करता है।
लोकगाथाओं में पूजाविधान के अनेक तरीके प्रचलित हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, शिव, कृष्ण, इन्द्र, हनुमान, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गवाँ देवी आदि की स्तुति किए बिना तो लोकगाथा का शुभारम्भ ही नहीं होता। लोकगाथा गायक, गाथा गाने से पूर्व सुमिरनी गाते हैं-
सुमिरि सारदा के पग ढरिए, गुस्र् अपने के चरण मनाय।
भुइयाँ गइए जाई खेरे की, माता नामु न जानौं तुमार।
जोइ-जोइ आखरु मैया भूलऊँ, दुरगा कण्ठ बैठि लिखि जाउ।
नारी के सतीत्व की रक्षा करना लोक-मानव अपना धर्म समझता है, नारी का `नारीत्व’ ही उसमे यदि छिन जाए तो फिर समाज में उसका जीवन व्यर्थ है-
“अकिली आजु फँसी तबुँअन में, संकट में है धरमु हमार।”
किसी बड़े संकट के आ जाने पर लोक-मानव देवी-दवताओं से प्रार्थना करता है। उसे विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना को देवी-देवता अवश्य सुनते हैं और वे साक्षात् सहायता करते हैं। भले ही यह कोरा विश्वास ही क्यों न हो परन्तु मनोवैज्ञानिक रूप से लोक-मानव को इस विश्वास से बहुत सम्बल मिलता है।`ढोला’ लोकगाथा का यह अंश द्रष्टव्य है-
ढोला और करहा ने दुर्गा माँ से डोर लगाई।
सुन भक्तन की टेर, भगवती ले जमात सँग आई।।
आइ गए भूत चुरैलें, भैरों और पिशाच।
जोगिनी खप्परु लइ के नाचि रही है नाचु।।
माँ काली कंकाली जौहरु रही दिखलाय।
बुहत से दानी मारे, भाजे कुछ जान बचाय।।
लोकगाथाओं में देवीपूजन के प्रसंग भरे पड़े हैं। बलि प्रथा का भी चित्रण लोकगाथाओं में मिलता है। पूजा की सामग्री, विधि विधान को लोकगाथाएँ जीवित बनाए हुए हैं-
देवी चण्डी के पूजन हित सब सामान लियौ मँगवाय।
पान, फूल और अक्षत मेवा सोने थाल लए भरवाय।।
ध्वजा नारियल और मिठाई, फूलन हार करे तैयार।
निम्बू, खप्परु, बकरा, मेढ़ा लइके ज्वालासिंह सरदार।।
लोक-मानव का यह सहज विश्वास है कि देवी के प्रसन्न होने पर उसका कार्य सफल हो जाएगा। इसी विश्वास को पुष्ट करने के लिए वह पूजा विधान करता है। युद्ध भूमि या किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए जाने वाले वीरों के माथे पर मंगल कामना के लिए टीका और विजय की कामना के लिए भुजा पूजी जाती है-
स्र्चना करिके तब आल्हा को, भुजबल पूजे मल्हन्दे आइ।
भुजा पूजि दई नर मलिखे की, दओ माथे पर तिलक लगाइ।।
संध्या आरती के लिए चोमुखा दीपक जलाना, लोक संस्कृति है। लोक गाथाओं में इसका चित्रण मिलता है-
आरति लइ के कर सोने की, वामे चामुख दिअना वारि।
ले के चलि भई मल्हना रानी, औ द्वारे पइ पहुँची जाइ।।
बड़ों का सम्मान करना लोकधर्म है-
पायँ लागि के रानि मल्हना के, कर को कंकन धरो उतारि।
पतिव्रता नारी के प्रति लोक-मानव स्म्मान दृष्टि रखता है-
पतिव्रता जो चाहे मन में, पल में परलय देय मचाय।
प्रकृति पूजा में लोक-मानव का अगाध विश्वास है-
पहिलो गिरासु दओ धरती कउ, दूजो गऊ चढ़ाओ।
पुनर्जन्म में लोक-मानव का विश्वास है यह उसे कर्तव्य पथ पर मर्यादित होकर चलने को बाध्य करता है। परलोक का ध्यान उसे बना रहता है, इस भय से वह अपने मानव-धर्म का पालन करता है-
हई ये लीला नारायन की, आवागमन सदा व्यवहार।
मरि के जनमइ फिरि मरि जाबइ आबइ लउटि फेरि संसार।।
लोकगाथाएँ लोक-मानस में यहीं संसार उद्भूत करती रहती हैं कि भले ही सब कुछ विपरीत होने लगे पर मानव को अपना धर्म कदापि नहीं छोड़ना चाहिए-
ब्रह्मा सृष्टि रचानो छोड़ें शिवजी छोड़ देइ संहार।
धर्म कर्म अरु क्षत्रीपन कौ , तबहुँ न जागन सकै बिसार।।
लोक मानव का विश्वास है कि यदि व्यक्ति अकेले में भी पाप-कर्म करता है तो भी वह छिपा नहीं रहता, वह प्रकट हो ही जाता है-
पाप छिपाये सइ ना छिपिहै, चढ़ि के मगरी पइ चिल्लाय।
किसी के घर का नमक खा लेने का अर्थ है कि उसके साथ कभी धोखा न करना। यही हमारी लोक-संस्कृति है-
मालूम नोनु परो पीछे सइ तब सब कहन लगे सकुचाय।
नमक बनाफर को खायो है सो देही में गयो समाय।।
इनसै दूजो नेक जो करिहों, परिहों नरक कुण्ड में जाय।
लोक जीवन में लोक संस्कृति का पूर्ण निर्वाह लोक-मानव करता है।
लोक-मानस में जहाँ यह संस्कार समाया हुआ है कि दैवीय शक्ति सब अच्छा ही करती है, इसलीए वह जो कुछ करे सब ठीक ही होगा। वहीं यह संस्कार भी छिपा पड़ा है कि यदि दैवीय शक्ति पक्षपात करती है, अनीति पूर्ण कार्य करती है, बुरे लोगों का साथ दे रही है, तो वह उस आद्यशक्ति से भी दो-दो हाथ करने का हौसला रखता है। असत्य के लिए वह काल से भी लड़ जाता है। एक ऐसा ही चित्रण देखिए-
धमक दई चण्डी के ऊपर जाने बड़े जोर से साँग,
चंडी गई पाताल समाय।
मंदिर की ढोला नैं दीनीं तब ईंट सों ईंट बजाय।।
ऐसी देवी और ऐसा मंदिर जहाँ अन्याय और अर्धम का कार्य होता हो तथा गलत उद्देश्य की पूर्ति हेतु जिसका प्रयोग किया जाता हो लोकमानस ऐसे देव मठ को तहस-नहस करने में थोड़ा भी संकोच नहीं करता।
कितने व्यावहारिक उद्देश्य एवं भावनाएँ निहित हैं लोकगाथाओं में समाहित लोक संस्कृति में । लोक संस्कृति में भारतीय संस्कृति के सभी प्रमुख तत्व समाहित हैं। आध्यात्मवादी दृष्टिकोण, बहुदेव वाद, समन्वय वाद, सेवा भाव, सम्मान का भाव, पवित्रता, अनेकता में एकता, विश्वास सहनशीलता, नारी सम्मान, ईश्वर पर विश्वास, अतिथि सेवा, शरणागत की रक्षा, व्रत व नियम पालन, अहिंसावादी दृष्टिकोण आदि समस्त भावनाएँ लोक गाथाओं में उभर कर सामने आती हैं। लोकगाथाएँ ही भारतीय संस्कृति को कालजयी बनाए हुए हैं। सांस्कृतिक चेतना का निर्मल स्वरूप लोक गाथाओं में ही देखने को मिलता है।

डॉ॰ जगदीश व्योम

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